तियानजिन में संपन्न शंघाई सहयोग संगठन (SCO) सम्मेलन ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि इक्कीसवीं सदी की भू-राजनीति बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रही है। रूस, चीन और भारत का एक मंच पर खड़ा होना केवल प्रतीकात्मक घटना नहीं है; यह उस गहरी बेचैनी का परिणाम है जो अमेरिका की नीतियों ने एशिया और यूरेशिया में पैदा की है। भारत के लिए यह क्षण अवसर भी है और चुनौती भी।

👉 अवसर

भारत लंबे समय से “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति अपनाता रहा है। कभी गुटनिरपेक्ष आंदोलन के रूप में, तो आज “मल्टी-अलाइनमेंट” के रूप में। SCO भारत को यह मंच देता है कि वह चीन और रूस जैसे पड़ोसी दिग्गजों के साथ बैठकर अपनी भूमिका मज़बूती से दर्ज करे। ऊर्जा, सुरक्षा, आतंकवाद और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी जैसे मुद्दों पर भारत को सहयोग का लाभ मिल सकता है।

रूस-भारत संबंध दशकों पुराने हैं। रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में यह साझेदारी भारत के लिए जीवनरेखा रही है। पुतिन और मोदी की निकटता बताती है कि यह धारा अभी भी जीवित है। वहीं चीन के साथ आर्थिक रिश्ते, तमाम मतभेदों के बावजूद, भारत की विकास यात्रा में निर्णायक साबित हो सकते हैं।

👉 चुनौतियाँ

परंतु इस मंच के साथ गहरी चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं।

  • सीमा विवाद: चीन के साथ लद्दाख और अरुणाचल की तनावपूर्ण स्थिति यह याद दिलाती है कि साझेदारी और प्रतिस्पर्धा साथ-साथ चल रही है।
  • रूस-यूक्रेन युद्ध: रूस की आक्रामकता और पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच भारत को संतुलन साधना है।
  • अमेरिका का दबाव: भारत और अमेरिका के बीच तकनीक, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी गहराती जा रही है। लेकिन SCO में खुला झुकाव दिखाना, वाशिंगटन को असहज कर सकता है।

👉 भारत का मार्ग

यही वह मोड़ है जहाँ भारत को ठंडे दिमाग से अपनी भूमिका परिभाषित करनी होगी। क्या हम केवल दर्शक बनकर बहुध्रुवीयता का हिस्सा रहेंगे, या सक्रिय होकर इस नए संतुलन के निर्माता भी बनेंगे?

भारत की शक्ति केवल उसकी सैन्य या आर्थिक क्षमता में नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक-सभ्यतागत विरासत और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता में है। यही पूँजी हमें SCO जैसे मंचों पर विशिष्ट बनाती है।

तियानजिन का संदेश साफ़ है—दुनिया अब किसी एक ध्रुव पर टिकेगी नहीं। लेकिन इस बदलती तस्वीर में भारत को यह तय करना है कि वह किन मित्रताओं को स्थायी बनाता है और किन अविश्वासों को धीरे-धीरे दूर करता है।

👉 यही भारत की असली परीक्षा है—क्या वह वैश्विक शक्ति-समीकरण का केवल मोहरा रहेगा, या निर्णायक खिलाड़ी बनेगा?

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