डिजिटल युग में इंटरनेट जहां अनगिनत अवसर लेकर आया है, वहीं गंभीर सुरक्षा चुनौतियाँ भी तेज़ी से बढ़ती जा रही हैं। हाल के वर्षों में भारत में ऑनलाइन इस्लामी कट्टरपंथ का उभार सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक नई और जटिल चुनौती बनकर सामने आया है। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप और बंद समूह अब कट्टरपंथी विचारधाराओं के प्रसार और युवाओं की भर्ती के प्रमुख साधन बन रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की विशाल युवा आबादी, स्मार्टफोन की बढ़ती पहुँच और बहुभाषी डिजिटल वातावरण कट्टरपंथी नेटवर्क को तेजी से फैलाने में मददगार साबित हो रहे हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन गतिविधियों में अचानक बढ़ोतरी ने भी कट्टरपंथी समूहों की ऑनलाइन मौजूदगी को और मजबूत किया है। ये समूह चुनिंदा धार्मिक व्याख्याओं, शिकायत-आधारित प्रचार और भावनात्मक संदेशों के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं को निशाना बनाते हैं। इसी बीच, साइबर सुरक्षा एजेंसियाँ भी इस उभरते खतरे से निपटने के लिए कदम तेज़ कर रही हैं। संदिग्ध डिजिटल गतिविधियों की निगरानी, भर्ती नेटवर्क की पहचान, बॉट फ़ार्म और अप्रामाणिक प्रचार चैनलों का पता लगाने जैसे उपाय लगातार मजबूत किए जा रहे हैं। सोशल मीडिया कंपनियों को भी स्थानीय भाषाओं में बेहतर मॉडरेशन और खतरनाक सामग्री के त्वरित निष्कासन के निर्देश दिए जा रहे हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तकनीक के बल पर इस खतरे को समाप्त नहीं किया जा सकता। स्कूलों, कॉलेजों और समुदाय स्तर पर डिजिटल साक्षरता, मीडिया समझ और सुरक्षित ऑनलाइन व्यवहार पर जागरूकता को बढ़ावा देना आवश्यक है। धार्मिक विद्वानों, शिक्षकों, सामुदायिक संगठनों और स्थानीय नेताओं की सक्रिय भूमिका भी महत्वपूर्ण है, ताकि अतिवादी विचारधाराओं का प्रभाव कम हो सके और संतुलित संदेश समाज तक पहुँचें। सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि ऑनलाइन कट्टरपंथ को केवल सुरक्षा मुद्दे के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह एक सामाजिक और तकनीकी—दोनों स्तरों पर मौजूद चुनौती है, जिसके समाधान के लिए कानूनी ढांचे, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की जवाबदेही और समुदाय-आधारित हस्तक्षेप, तीनों का समन्वित मॉडल ज़रूरी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऑनलाइन चरमपंथ का खतरा अवश्यंभावी नहीं है। सही रणनीतियों और व्यापक सहयोग के साथ इसे नियंत्रित किया जा सकता है, चुनौती केवल इतनी है कि सार्वजनिक सुरक्षा को मजबूत रखते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, बहुलवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा भी सुनिश्चित की जाए।
(लेखक : जर्नलिस्ट कृष्ण प्रजापति कैथल से पत्रकारिता कर रहे हैं और जनसंचार एवं पत्रकारिता में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र से स्नातकोत्तर हैं।)



