बिलख रही है मानवता एक रोटी की आस लिए,
सुर्ख अधरों पर कंपन है छलके नयना प्यास लिए।
हवस की आग में जल रही देह बन गई है बाज़ार,
और नयन से पिघल रही हिम-शिखरों-सी पीर अपार।
जठराग्नि के यज्ञ-कुंड में समिधा-सी जलता संसार,
नयनों के विरह-दीप तले तैल बने अश्रु की धार।
सीने से ढलके आँचल में थरथर काँप रही थी लाज,
अपनी चिता सजा उसने सबकी भूख मिटाई आज।
चारों ओर है धुआँ धुआँ हर ग्रास में है चिंगारी,
वह भूख नहीं है रोटी की बस बेबस है लाचारी।
सिंकतीं रहीं रोटियाँ उसकी अस्मिता की राखों में,
दर्द छलकता देखा हमने थकी हुई उन आँखों में।
दृष्टि के छविपट टूटे टूटे सपनों के भार तले,
सूनी राहों पर बिखरी स्मृतियाँ ठंडी सांझ ढले।।
लुप्त हो रही धरती पर इंसानो में इंसानियत,
अब मुखौटों की तह में पलती रहती हैवानियत?
मौन है सारी दिशाएँ पिघल रहा आकाश वहाँ।
आतुर मन है प्रश्न लिए—कहिए दोषी कौन यहाँ?
—मंजू भारद्वाज ‘कृष्णप्रिया’,
बंगलौर
9830453289



