यह किस्सा उस समय का है जब श्री लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री थे। ​एक बार शास्त्री जी को एक कपड़ा मिल (Textile Mill) का उद्घाटन करने के लिए बुलाया गया। कार्यक्रम के बाद, मिल के मालिक ने उन्हें मिल का गोदाम दिखाने का आग्रह किया। शास्त्री जी मिल के मालिक और अन्य अधिकारियों के साथ गोदाम में गए, जहाँ बहुत ही बेहतरीन और कीमती साड़ियाँ रखी हुई थीं।
​मिल मालिक ने बड़े गर्व से शास्त्री जी को कुछ सबसे महंगी और बेहतरीन साड़ियाँ दिखाते हुए कहा:
​”शास्त्री जी, ये साड़ियाँ हमारी मिल की सबसे बेहतरीन कारीगरी का नमूना हैं। कृपया आप इनमें से कुछ अपनी धर्मपत्नी (ललिता शास्त्री जी) के लिए भेंट स्वीकार करें।”
​शास्त्री जी ने साड़ियों को देखा, वे सचमुच बहुत सुंदर थीं। मिल मालिक और वहाँ मौजूद सभी लोग उत्सुकता से देख रहे थे कि प्रधानमंत्री अब क्या करते हैं। क्या प्रधानमंत्री एक सार्वजनिक भेंट के रूप में, इतनी महंगी साड़ियों का तोहफा स्वीकार कर लेंगे?
​शास्त्री जी मुस्कुराए। उनकी अगली बात सुनकर मिल मालिक और सभी लोग स्तब्ध रह गए।
​शास्त्री जी ने शांति से जवाब दिया:
​”ये साड़ियाँ तो वाकई बहुत अच्छी हैं। लेकिन मैं इन्हें भेंट में नहीं ले सकता। अगर मुझे खरीदनी ही हैं, तो मुझे सबसे सस्ती साड़ियाँ दिखाइए।”
​मिल मालिक कुछ समझ नहीं पाया और विनम्रतापूर्वक बोला, “सर, यह तो आपके लिए हमारी ओर से एक छोटा-सा तोहफा है। इसमें खरीदने की क्या बात है?”
​तब शास्त्री जी ने अपनी चिर-परिचित सादगी और दृढ़ता से कहा:
​”भाई, मैं प्रधानमंत्री हूँ, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं वो चीज़ें मुफ्त में ले लूँ जो मैं खरीद नहीं सकता। मेरी पत्नी की हैसियत और मेरी तनख्वाह इतनी महंगी साड़ियाँ खरीदने की नहीं है। जो चीज़ मैं अपनी कमाई से नहीं खरीद सकता, उसे भेंट में लेकर पहनना मेरी ईमानदारी के सिद्धांतों के खिलाफ है।”

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