कैथल (कृष्ण प्रजापति): देश में बढ़ती असहिष्णुता और धार्मिक तनाव के बीच एक मुस्लिम महिला ने कहा है कि सूफीवाद की करुणा आधारित परंपरा आज समाज के लिए पहले से ज़्यादा ज़रूरी हो गई है। उनका कहना है कि सूफी शिक्षाएँ आस्था को कठोरता नहीं, बल्कि विनम्रता, दया और आत्मचिंतन से जोड़ती हैं और यही दृष्टि नफरत और कट्टरता को कम करती है। उन्होंने बताया कि बचपन में परिवार की महिलाओं से उन्हें यह सीख मिली कि धर्म का असली अर्थ चरित्र और व्यवहार में दिखाई देता है, न कि केवल बाहरी रस्मों में। उनके अनुसार सूफीवाद का आधार तज़किया यानी आत्मा की शुद्धि है, जो व्यक्ति को गुस्से और नफरत जैसी भावनाओं से दूर करता है।
महिला का कहना है कि आज के माहौल में कई युवा पहचान, असुरक्षा और सामाजिक दबाव के कारण उग्र विचारों की ओर झुक जाते हैं, जबकि सूफीवाद उन्हें भीतर की स्थिरता और अपनापन देता है। उन्होंने सूफी अवधारणा इश्क़ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह सोच सभी इंसानों को बराबरी से देखने पर जोर देती है, जिससे समाज में विभाजन की जगह सामंजस्य बढ़ता है। उन्होंने कहा कि सूफी परंपरा ऐतिहासिक रूप से समावेशी रही है और सूफी स्थानों पर अलग–अलग पृष्ठभूमि के लोग बिना भेदभाव के एक साथ आते रहे हैं।
उन्होंने सोशल मीडिया पर बढ़ते उकसावों और गलत सूचनाओं के बीच सूफी सब्र यानी धैर्य को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह दृष्टिकोण भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। उनका कहना है कि कट्टरता का हल केवल निगरानी या नीतियों में नहीं, बल्कि उस भावनात्मक खालीपन को भरने में है जहाँ से उग्रता की शुरुआत होती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान तनावपूर्ण माहौल में सूफी मूल्य समाज में संवाद, संयम और आपसी भरोसा बढ़ाने के प्रभावी साधन साबित हो सकते हैं।



