सेक्स के लिए युवक-युवतियों में तरह-तरह के जुगाड़ कोई नई बात नहीं है। इतिहास गवाह है कि केवल जुगाड़ ही नहीं, बल्कि सत्ता, युद्ध और बड़े-बड़े संघर्षों की जड़ में भी यह आकर्षण रहा है। यह आकर्षण इतना प्रबल है कि ऋषि विश्वामित्र जैसे महान तपस्वियों की वर्षों की साधना को भी विचलित कर गया था।
दरअसल, यह आकर्षण मानव जाति के अस्तित्व और निरंतरता के लिए आवश्यक है। सवाल यह नहीं कि यह आकर्षण क्यों है—सवाल यह है कि आज यह इतना बेचैन और बेकाबू क्यों दिखाई देता है?
कहा जाता है, “प्यार में पड़ा व्यक्ति सबसे ज़्यादा झूठ बोलता है।” शायद इसलिए क्योंकि समाज ने प्रेम और सेक्स दोनों को स्वाभाविक मानने के बजाय उन्हें छुपाने की चीज़ बना दिया है।
हमारे सामाजिक ढाँचे में आज भी सेक्स पर खुलकर बात करना अश्लील समझा जाता है, जबकि भोजन और पानी की तरह यह भी एक मानवीय आवश्यकता है। ऊपर से आज की जीवन-शैली, मोबाइल फोन पर पोर्न सामग्री की सहज उपलब्धता और पश्चिमी संस्कृति का आकर्षण—इन सबने मिलकर युवक-युवतियों के मन में इसे और अधिक केंद्र में ला खड़ा किया है।
जब ज़रूरत को स्वीकार करने का स्वस्थ रास्ता बंद हो, तो लोग जुगाड़ ढूँढते हैं—यही मानव स्वभाव है।
शायद यही कारण है कि आज महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक, पार्कों, ऐतिहासिक स्थलों, मेट्रो स्टेशनों और सार्वजनिक स्थानों पर ऐसे दृश्य आम होते जा रहे हैं। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ जैसे शहरों के कई पार्क और पर्यटन स्थल इसके उदाहरण बन चुके हैं।
यह आकर्षण इतना तीव्र है कि जितनी ताक़त से चुंबक लोहे को खींचता है, उससे कहीं अधिक बल से यह मनुष्य को अपनी ओर खींचता है।
हँसी-मज़ाक में कहा जा सकता है—अगर यही एकाग्रता पढ़ाई में लग जाए, तो न जाने क्या-क्या कर लें! 😊
लेकिन सच यह भी है कि इसमें केवल युवक-युवतियों का दोष नहीं है। यह उम्र, हार्मोन और जवानी का स्वाभाविक उबाल है,
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