🌷🌷🌷🌷
एक बहुत पुराना पेड़ था। उसकी केवल कुछ ही टहनियां बची थी जो हरी भरी थी। एक टहनी पर अच्छे फल लग जाते थे। बाकि टहनियों पर एकाध ही फल लगता था। उस टहनी को बड़ा अहंकार हो गया। क्योंकि जो भी पेड़ के पास से गुजरता उस फलों वाली टहनी को ही देखता और कहता की देखो इस टहनी पर कितने फल लगे है। नहीं तो इस पेड़ की और कोई देखे भी नहीं। टहनी और फूल कर कुप्पा हो जाती की मैं ही हूँ जो कुछ हूँ। वर्ना इस पेड़ के पास है क्या। मुझे तो किसी बड़े और हरे भरे पेड़ के पास होना चाहिए था। एक दिन माली ने सारे फल एक साथ तोड़ने के चक्कर में उस टहनी में कांटा डालकर इतनी जोर से झटका की टहनी टूटकर पेड़ से अलग हो गयी। और फिर क्या था दो से तीन घंटे में सुख गयी। माली ने बहुत कोशिश कि उसे पानी में रखकर हरी भरी रखने कि मगर अब क्या था जड़ों से दूर जो हो गयी थी। अब पेड़ की जो बची खुची टहनियां थी वो ज्यों की त्यों थी। मगर उस टहनी का सारा अहंकार चूर चूर हो गया। क्योंकि उसे पता चल चुका था कि पेड़ भले ही कमजोर और पुराना था। मगर उसका पोषण अपनी जड़ों से वही कर रहा था।
यहाँ मेरा इतना लम्बा छोड़ा भाषण देने का पर्याय अपनी बुद्धिमत्ता सिद्ध करने का नहीं है कि मुझे बहुत ज्ञान हो गया है। मगर मुझे वो अनुभव हो गया है जीवन का जो बहुतों को पूरा जीवन नहीं हो पता। यहाँ मैं उन परिवारों, परिवार के सदस्यों को समझने का एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूँ। जो कुछ पढ़ लिखकर काबिल बन जाते हैं और अपने माता पिता और भाइयों, परिजनों से किनारा कर लेते हैं कि मेरे कारण ही परिवार चल रहा है। ये अज्ञानी क्या जानते हैं। मैं ही बुद्धिमान हूँ। जब आप परिवार से अलग हो जाते हो तो उस टहनी कि तरह ही आपको सूखने से कोई नहीं रोक सकता। इसलिए जितना हो सके मिलकर चलिए। पैसे से रोटी खरीदी जा सकती है, भूख नहीं। दवाई खरीदी जा सकती है, मगर कोई भी दवाई किसी बीमारी को ठीक करने कि गारंटी नहीं देती। जिस तनाव के लिए हम हजारों रूपये कि दवाइयां कहते हैं वो एक कंधे पर रखे हाथ और कमर पर दी गयी हलकी सी थपकी से छू मंतर हो जाता है। वो भी मुफ्त में।



