दस मंजिल ऊपर बिल्डिंग पर खड़ा इंजिनियर जमीन पर खड़े मजदूर को आवाज लगा रहा था। मगर दूरी और शौर शराबे के कारण मजदूर को आवाज सुनाई नही दे रही थी। इंजीनियर ने एक तरकीब सोची कि ऊपर से सौ का नोट डालता हूँ। मजदूर नोट उठायेगा तो जरूर ऊपर देखेगा कि नोट कहाँ से आया। नोट नीचे डाला मजदूर ने नोट उठा लिया मगर ऊपर नही देखा । इंजीनियर ने 500 का नोट नीचे फेंका। मजदूर ने वो नोट भी उठा लिया मगर ऊपर नही देखा। इंजीनियर ने एक छोटा सा कंकर उठा कर नीचे फेंका। कंकर मजदूर के सिर मे लगा। चोट लगते ही मजदूर ने तुरंत ऊपर देखा। ऊपर देखते ही इंजीनियर ने उसे बुला लिया। यहाँ इंजीनियर भगवान है मजदूर हम सब। जब तक वो दे रहा है। हम अंधाधुंध बटोरने मे लगे हैं। न हमे बुरे कर्मो का डर है। न किसी की हाय लगने का। बस पैसा आना चाहिए । मगर जब हमारी खोपडी पर कंकर लगता है। तब हमे उचित अनुचित का ध्यान आता है। तब ईश्वर की याद आती है। चोट लगे बिना इंसान की समझ मे कुछ नही आता। बुरे कर्मो से डरिये। क्योंकि जरूरी नही है ईश्वर हर बार छोटा कंकर ही फेंके। कई बार वह बड़े वाला भी फेंक देता है। सम्भलने का मौका भी नही देता। अच्छे दिनों मे सही बने रहे। ताकि ईश्वर को कंकर फेंकना ही ना पड़े।
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