चण्डीगढ़ : सनातन परंपरा में लोक आस्था और सूर्य उपासना के महापर्व छठ पूजा का विशेष महत्व है।इस चार दिवसीय महापर्व में छठव्रती सूर्यदेव और छठी मैया की पूजा करते हैं। यह पूजा पूर्ण रूप से सादगी और सात्विकता के साथ प्रकृति तथा पर्यावरण के संरक्षण को समर्पित है। छठव्रती रीमा प्रभु ने बताया कि कल नहाए खाए से विश्व कल्याण की कामना के साथ चार दिवसीय सूर्य उपासना के महाव्रत की शुरुआत करने के बाद आज सायंकाल पवित्रता और शुद्धता के साथ खरना के प्रसाद में गुड़, दूध और चावल की खीर तथा गेहूँ के आटा से बनी देसी घी लगी रोटी तैयार कर छठी मैया और सूर्यदेव के आराधना और प्रसाद अर्पण के बाद प्रसाद ग्रहण कर अगले 36 घंटे के निर्जला कठोर व्रत की शुरुआत हुई तथा सभी परिवारजनों एवं शुभचिंतकों को मंगलकामना के साथ खरना का प्रसाद वितरित किया जाएगा।जय मधुसूदन जय श्रीकृष्ण फाउंडेशन के संस्थापक एवं पूर्वांचल परिवार शुभचिंतक पर्यावरण सेवक प्रभुनाथ शाही ने बताया कि खरना का अर्थ होता है शुद्धता और इस दिन शुद्धता तथा पवित्रता का विशेष ध्यान रखते हुए अगले निर्जला व्रत के निर्विघ्न पूर्ण होने की कामना की जाती है। खरना का दिन छठी मैया के आगमन, भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। खरना के दिन छठव्रती के घर छठी मैया का शुभ आगमन होता है और छठी मैया अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। खरना के बाद छठव्रती कठिन निर्जला व्रत के लिए मानसिक और आध्यात्मिक रूप से तैयार होती है। खरना के दिन के खीर प्रसाद का विशेष महत्व है और इसे रसियाव भी कहा जाता है। यह प्रसाद शुद्धता और सुखमय जीवन का प्रतीक है तथा सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला होता हैं।अगले दिन गेहूँ के आटा और गुड़ से देशी घी में ठेकुआ तैयार किया जाता है और यह महाप्रसाद,केला एवं अन्य फल छठी मैया और सूर्यदेव को अर्पित किया जाता है।

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