लेखक : डॉ. सुभाष कागड़ा

हरियाणा के प्रतिष्ठित महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक में हाल ही में हुई एक घटना ने पूरे समाज की संवेदनशीलता और प्रशासनिक नैतिकता पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। रिपोर्टों के अनुसार, विश्वविद्यालय प्रशासन के कुछ अधिकारियों ने महिला सफाई कर्मचारियों से यह प्रमाण मांगा कि वे मासिक धर्म (Periods) के कारण अवकाश पर थीं । यह घटना न केवल संवेदनहीनता का प्रतीक है, बल्कि यह दर्शाती है कि आज भी हमारे संस्थानों में वर्गीय, लैंगिक और जातिगत भेदभाव किस गहराई तक पैठा हुआ है । यह केवल एक घटना नहीं — एक मानसिकता का प्रतिबिंब है । जब किसी विश्वविद्यालय में कार्यरत महिला सफाई कर्मचारी से उसके पीरियड्स का सबूत मांगा जाता है, तो यह केवल व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त समानता और गरिमा के अधिकार का भी खुला उल्लंघन है । यह मानसिकता उस गहरे पूर्वाग्रह की उपज है जिसमें “महिला” और “सफाई कर्मचारी” — दोनों ही शब्द समाज के सबसे निचले पायदान पर रखे जाते हैं।
उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे न केवल अपना श्रम, बल्कि अपनी शारीरिक सच्चाई भी साबित करें।

  • कानूनी और संवैधानिक दृष्टिकोण :
  1. कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (POSH) अधिनियम, 2013 के अनुसार किसी महिला से उसकी निजी शारीरिक स्थिति के बारे में जबरन पूछताछ या सबूत मांगना मानसिक उत्पीड़न की श्रेणी में आता है ।
  2. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को गरिमा के साथ जीवन का अधिकार देता है। किसी महिला से उसके पीरियड्स का प्रमाण मांगना इस मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है ।
  3. यदि यह घटना सफाई कर्मचारी समुदाय के किसी वर्गीय या जातिगत पूर्वाग्रह के आधार पर हुई है, तो यह अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत भी दंडनीय अपराध है ।

इसलिए यह मामला केवल प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा और मानवाधिकारों का उल्लंघन है ।

  • मासिक धर्म: शर्म नहीं, स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है :

मासिक धर्म को लेकर भारतीय समाज में अब भी गहरी चुप्पी, शर्म और मिथक जुड़े हुए हैं।
जबकि यह एक प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया है, जिसके कारण मानव जीवन संभव होता है।
ऐसे में यदि एक महिला सफाई कर्मचारी अपने स्वास्थ्य कारणों से अवकाश मांगती है, तो यह उसका अधिकार है, न कि स्पष्टीकरण देने का दायित्व ।

यह सोच — कि किसी महिला को अपने शरीर की स्थिति का सबूत देना पड़े — न केवल लैंगिक भेदभाव की परिणति है, बल्कि वर्गीय घृणा (Class Hatred) का भी रूप है ।

  • सफाई कर्मचारी: समाज का अनदेखा स्तंभ :

क्या यह सवाल किसी महिला प्रोफेसर या अधिकारी से पूछा जाता ? स्पष्ट है — नहीं ।
क्योंकि हमारे संस्थानों और समाज में आज भी “सफाई कर्मचारी” शब्द सुनते ही सम्मान की जगह घृणा और दूरी का भाव उभर आता है।

ये वही लोग हैं जो हर सुबह हमारे विद्यालयों, दफ्तरों और सड़कों को साफ़ रखते हैं, लेकिन स्वयं अपने सम्मान और सुरक्षा के लिए संघर्ष करते हैं । उनके साथ इस प्रकार का व्यवहार करना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि यह जाति आधारित सोच और वर्गीय भेदभाव को भी उजागर करता है ।

महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपने जीवनभर स्त्री-शिक्षा, समानता और समाज-सुधार का संदेश दिया। उनके नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय में यदि आज महिला कर्मचारियों के साथ ऐसी अमानवीय पूछताछ हो रही है, तो यह महर्षि के आदर्शों का घोर अपमान है ।

  • अब ज़रूरत है बदलाव की :
  1. विश्वविद्यालय प्रशासन को इस घटना पर सार्वजनिक माफ़ी मांगनी चाहिए ।
  2. संबंधित अधिकारियों पर निष्पक्ष जांच और दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए ।
  3. सभी संस्थानों में लैंगिक संवेदनशीलता (Gender Sensitization) प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए ।
  4. सफाई कर्मचारियों के लिए गोपनीयता और गरिमा नीति तैयार की जाए ।
  5. मासिक धर्म से जुड़ी सकारात्मक शिक्षा और संवाद को बढ़ावा दिया जाए ।

सिर्फ हाथ नहीं — सोच भी साफ़ करनी होगी :

यह घटना हमें यह सोचने पर विवश करती है कि नारी सम्मान अब भी केवल नारा भर है। जब तक किसी महिला सफाई कर्मचारी को अपने दर्द, अपने शरीर और अपने अस्तित्व का सबूत देना पड़ेगा, तब तक हमारा समाज “समानता” की परिभाषा से कोसों दूर रहेगा। यह समय है कि हम अपने भीतर झाँकें – क्योंकि सफाई केवल गलियों और गलियारों की नहीं, विचारों और दृष्टिकोणों की भी ज़रूरत है ।

(लेखक वाल्मीकि अंबेडकर एंप्लाइज एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष हैं )

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