अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि पुलिस FIR दर्ज करने में देर करती है या कभी-कभी तुरंत FIR नहीं लेती। लेकिन इसके पीछे सिर्फ “लापरवाही” नहीं, बल्कि एक पूरी कानूनी और तकनीकी प्रक्रिया होती है जिसे बहुत कम लोग समझते हैं।
सबसे पहले पुलिस को यह तय करना होता है कि मामला Cognizable है या Non-Cognizable। Cognizable अपराध जैसे चोरी, मारपीट, धोखा, गुमशुदगी, आदि में FIR तुरंत दर्ज होती है। लेकिन Non-Cognizable अपराध जैसे गाली-गलौज, हल्का विवाद, धमकी में FIR नहीं, बल्कि NCR दर्ज की जाती है और कोर्ट की अनुमति से आगे की कार्रवाई होती है।
दूसरी प्रक्रिया है प्राइमरी वेरिफिकेशन। कई बार पुलिस को पहले यह देखना पड़ता है कि घटना सच में घटित हुई है या सिर्फ गलत सूचना है। इसके लिए वह मौके का ब्योरा, सबूत, और गवाहों की शुरुआती जानकारी लेती है ताकि FIR सही धारा में दर्ज हो।
कई मामलों में विलंब का कारण होता है कम स्टाफ, ज्यादा केस, या एक ही समय में कई शिकायतें। शहरी थानों में रोज सैकड़ों लोग आते हैं, जिससे प्रोसेस कभी-कभी धीमी हो जाती है।
लेकिन कानून साफ कहता है किसी भी Cognizable offense में FIR दर्ज करना पुलिस की कानूनी जिम्मेदारी है। अगर FIR नहीं ली जा रही हो, तो नागरिक 100, SP ऑफिस, या ऑनलाइन पोर्टल पर शिकायत दर्ज कर सकते हैं।
मतलब साफ: FIR सिर्फ कागज़ नहीं इतनी गंभीर डॉक्यूमेंट है कि पुलिस को गलती की गुंजाइश भी नहीं रखनी पड़ती।



