(राकेश कथूरिया रिपोर्टर कैथल)
कैथल
केंद्रीय मंत्रीमंडल द्वारा बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा को 100 प्रतिशत तक बढ़ाने को मंजूरी दिए जाने पर ऑल इंडिया इंश्योरेंस एम्पलाइज एसोसिएशन ने विरोध जताया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पूंजी-परस्त आर्थिक सुधारों की एक श्रृंखला को मंजूरी दी है, जिसमें बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को 100 प्रतिशत तक बढ़ाने तथा बीमा क़ानून (संशोधन) विधेयक को स्वीकृति देना शामिल है। नोर्दन जोन इंश्योरेंस एम्पलाइज एसोसिएशन (एनजेडआईईए) के कैथल शाखा सचिव पंकज खेड़ा ने कहा कि बीमा क्षेत्र में एफडीआई सीमा बढ़ाने को लेकर लगातार विरोध दर्ज करवाया जा रहा है। एआईआईईए की मांग है कि आर्थिक नीतियों को कॉरपोरेट-परस्त झुकाव से हटाकर जनोन्मुखी दिशा में पुनर्संरेखित किया जाए। सरकार को कॉरपोरेट मुनाफ़े से ऊपर जनता के हितों को रखना चाहिए। पंकज खेड़ा ने कहा कि बीमा क्षेत्र का डी-नेशनलाइजेशन वर्ष 1999 में आईआरडीए विधेयक के पारित होने के साथ किया गया था। इसके बाद से विदेशी साझेदारों के साथ अनेक निजी बीमा कंपनियां जीवन और गैर-जीवन—दोनों क्षेत्रों में कार्यरत हैं। इन कंपनियों के व्यवसाय संचालन के लिए पूंजी कभी भी बाधा नहीं रही है। वास्तव में, बीमा क्षेत्र में कुल एफडीआई, नियोजित पूंजी का मात्र लगभग 32 प्रतिशत ही है। ऐसी स्थिति में सरकार द्वारा एफडीआई सीमा को 100 प्रतिशत तक बढ़ाना और विदेशी पूंजी को भारत में पूर्ण स्वतंत्रता देना पूरी तरह से तर्कहीन है। इस निर्णय के न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था पर, बल्कि भारतीय बीमा कंपनियों पर भी गंभीर दुष्परिणाम पड़ेंगे। उन्होंने कहा कि विदेशी पूंजी को पूर्ण स्वतंत्रता और अधिक पहुंच देने से बीमा उद्योग की सुव्यवस्थित वृद्धि अवरुद्ध होगी तथा लोगों और व्यवसायों को आवश्यक सुरक्षा प्रदान करने के बजाय मुनाफ़ा-केंद्रित दृष्टिकोण हावी होगा। इसका भारतीय समाज के वंचित और हाशिए पर खड़े वर्गों के हितों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त, विदेशी पूंजी कभी भी घरेलू बचत का विकल्प नहीं हो सकती। अखिल भारतीय बीमा कर्मचारी संघ इस निर्णय की कड़ी निंदा करता है और इसके विरुद्ध जनमत को संगठित करना निरंतर जारी रखेगा।



