आज हम जिस दौर में जी रहे हैं, वह तकनीकी प्रगति का स्वर्णकाल कहलाता है।तकनीक ने हमारे जीवन को तेज़, सरल और सुविधाजनक बनाया है पर इसी के साथ एक प्रश्न भी हमारे सामने खड़ा है—
क्या इस प्रगति के साथ हमारी मानवीय संवेदनाएँ भी उतनी ही विकसित हुई हैं?
आज हमारे पास अपार ज्ञान है, असीम सूचना है,
लेकिन क्या हमारे पास उतनी ही संवेदना, सहानुभूति और नैतिक विवेक भी है? हम एक क्लिक में दुनियां से जुड़ जाते हैं पर क्या दिल से भी उतनी ही गहराई से जुड़ पा रहे हैं ?
आज जब मशीनें निर्णय लेने लगी हैं,तो मनुष्य के विवेक की भूमिका क्या रह जाती है ?
यह सोचना आज ज़रूरी हो गया है।
क्योंकि तकनीक स्वयं नैतिक नहीं होती, नैतिकता उसे दिशा देने वाले मनुष्य से आती है।
आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बढ़ी है,लेकिन उसके साथ उत्तरदायित्व का प्रश्न भी उतना ही बड़ा हो गया है।
कहने की आज़ादी और कहने की ज़िम्मेदारी—
इन दोनों के बीच संतुलन बनाए बिना कोई भी समाज स्वस्थ नहीं रह सकता।
तकनीकी उन्नति के साथ नैतिक उन्नयन भी अनिवार्य है।
क्योंकि यदि ज्ञान चरित्र से आगे निकल जाए तो वह समाज के लिए निर्माण नहीं, विनाश का कारण बनता है।
आज जरूरत है इस पर विचार करने की।
ताकि हम केवल स्मार्ट समाज ही नहीं,बल्कि एक संवेदनशील और जिम्मेदार समाज का निर्माण कर सकें।
मंजू भारद्वाज कृष्णप्रिया (9830453289)



