• यह तथ्य किसी से छिपा नहीं कि हरियाणा भारत का सबसे बड़ा स्पोर्ट्स पावरहाउस है।भारत के ओलिंपिक इतिहास में हरियाणा का प्रदर्शन बेजोड़ रहा है। देश की कुल आबादी का मात्र 2% हिस्सा रखने वाला यह राज्य खेलों में भारत को मिले पदकों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा अकेले हासिल कर चुका है।ओलंपिक हो या एशियाई खेल—हर बार देश को मिलने वाले पदकों में हरियाणा का दबदबा स्पष्ट दिखाई देता है। पेरिस 2024 में तो भारत के छह में से चार पदक हरियाणा के खिलाड़ियों ने जीतकर एक बार फिर साबित किया कि यह राज्य खेल प्रतिभा की असली धरती है। गांवों में कुश्ती के अखाड़े हों, निशानेबाज़ी के उभरते सितारे हों या मुक्केबाज़ी की नई पीढ़ी—हरियाणा ने हर बार देश को विश्वस्तरीय खिलाड़ी दिए हैं।इसके बावजूद जब अंतरराष्ट्रीय मेगा इवेंट्स की मेजबानी की बात आती है, तो हरियाणा पीछे छूट जाता है। जबकि राज्य के पास मजबूत खेल नीतियाँ, आवासीय खेल अकादमियाँ, खेल नर्सरी मॉडल और ग्रामीण स्तर पर फैला खेल ढांचा मौजूद है। विशेषज्ञों का मानना है कि हरियाणा प्रदर्शन में जितना मजबूत है, उतना ही उसे मेजबानी के लिए नीति-स्तर की रणनीति, अंतरराष्ट्रीय मानकों की सुविधाएँ और केंद्र के साथ बेहतर तालमेल की जरूरत है।हरियाणा के विपक्षी सांसद पिछले कई दिनों से लगातार संसद में और संसद से बाहर यह मुद्दा उठा रहे हैं। उनका कहना है कि जब पदक हरियाणा के खिलाड़ी जीतते हैं, तो मेगा इवेंट्स आयोजित करने का मौका भी हरियाणा को मिलना चाहिए। वे 2030 के कामनवेल्थ और 2036 के ओलंपिक हरियाणा में करवाने की मांग के साथ खेल बजट बढ़ाने और राज्य को खेलों में विशेष प्राथमिकता देने की भी मांग कर रहे हैं। उन्होने आरोप लगाया कि राज्य के साथ गंभीर अन्याय हो रहा है। उनका कहना है कि हरियाणा वह भूमि है जो कॉमनवेल्थ, एशियन गेम्स और ओलंपिक में भारत के लिए लगभग 50 प्रतिशत मेडल जीतकर लाती है, फिर भी उसे लगातार नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 की मेज़बानी गुजरात को दिए जाने और ओलंपिक 2036 के लिए भी गुजरात सेआधिकारिक बोली लगाने की घोषणा से यह पक्षपात और स्पष्ट हो जाता है। उनका तर्क है कि अब खेलों पर होने वाला अधिकांश निवेश गुजरात में खर्च होगा, जबकि यही बजट अगर हरियाणा के खिलाड़ियों पर लगाया जाता, तो वे और भी अधिक मेडल देश के नाम कर सकते थे। उन्होंने यह भी बताया कि ‘खेलो इंडिया’ के ₹3500 करोड़ के बजट में गुजरात को ₹600 करोड़ मिले, जबकि सबसे अधिक मेडल दिलाने वाले हरियाणा को केवल ₹80 करोड़ ही दिए गए। स्थिति इतनी खराब है कि आज हरियाणा के खेल ढांचे की दशा बास्केटबॉल कोर्ट्स में खिलाड़ियों की जान तक जोखिम में डाल रही है। इसलिए मांग की गई कि कॉमनवेल्थ 2030 और ओलंपिक 2036 में हरियाणा को कम से कम को-होस्ट राज्य बनाया जाए, ताकि लाखों करोड़ के बजट में से कुछ राशि हरियाणा के खेल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने में भी खर्च हो सके।यह भी समझना आवश्यक है कि हरियाणा सिर्फ खिलाड़ियों के प्रदर्शन के दम पर नहीं, बल्कि अपनी खेल संस्कृति, ठोस खेल ढांचे और जमीनी स्तर पर तैयार हो रही नई पीढ़ी की बदौलत भी मेजबानी का हक़दार बनता है। यहां का खेल तंत्र किसी भी अंतरराष्ट्रीय इवेंट की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है—चाहे वह अत्याधुनिक स्टेडियम हों, सक्षम कोचिंग स्टाफ, या खिलाड़ियों के लिए आधुनिक पुनर्वास एवं प्रशिक्षण सुविधाएँ। कई जिलों में स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटीज़, स्पोर्ट्स साइंस सेंटर और हाई-परफॉर्मेंस हब तेजी से विकसित हुए हैं, जो किसी भी बड़े आयोजन की तैयारी के लिए मजबूत आधार प्रदान करते हैं।इसके साथ ही हरियाणा सरकार ने हाल के वर्षों में खिलाड़ियों को कैश इनाम, सरकारी नौकरियाँ, स्पोर्ट्स कोटा और प्रोत्साहन नीतियों के रूप में जिस तरह व्यापक समर्थन दिया है, वह अन्य राज्यों के लिए मिसाल है। इससे न केवल राज्य में खेलों का माहौल बना है बल्कि यह संदेश भी गया है कि हरियाणा खेलों के लिए समर्पित है। इसलिए जब ओलंपिक या कॉमनवेल्थ जैसी मेजबानी की बात आती है, तो हरियाणा का दावा सिर्फ भावनात्मक नहीं बल्कि पूरी तरह व्यवहारिक, तर्कसंगत और देशहित में है। राज्य न केवल पदक लाकर भारत का गौरव बढ़ा सकता है, बल्कि वैश्विक आयोजनों को सफलतापूर्वक आयोजित करके देश की खेल क्षमता का विश्व मंच पर शानदार प्रदर्शन भी कर सकता है।हरियाणा की विपक्षी पार्टियां कर रहे हैं।स्पष्ट है कि यदि हरियाणा मेजबानी की दौड़ में अपना स्थान पक्का करना चाहता है, तो उसे खेल प्रदर्शन की तरह खेल कूटनीति को भी उतनी ही मजबूती से आगे बढ़ाना होगा।

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