एक दिन देवर्षि नारद के मन में एक प्रश्न उठा।
उन्होंने भगवान से निवेदन किया—
“प्रभु! आपने देखा होगा, आपके सच्चे भक्त प्रायः अभाव में जीवन बिताते हैं,
और जो आपको न मानें, वे वैभव में डूबे रहते हैं।
यह कैसी लीला है?”
भगवान मंद मुस्कान के साथ बोले—
“नारद, मेरी कृपा को आँखों से नहीं, समझ से देखा जाता है।
चलो, आज तुम्हें इसका रहस्य प्रत्यक्ष दिखाता हूँ।”
इतना कहकर भगवान साधु-वेश धारण कर नारद के साथ पृथ्वी पर उतरे।
पहला द्वार – धन का अहंकार
वे एक अत्यंत धनवान सेठ के घर पहुँचे।
भगवान ने द्वार खटखटाकर कहा—
“वत्स, कई दिनों से भूखे हैं,
यदि थोड़ा-सा अन्न मिल जाए तो कृपा होगी।”
सेठ बाहर आया, साधुओं को देखकर नाक-भौं सिकोड़ ली।
कर्कश स्वर में बोला—
“यह कोई धर्मशाला है क्या?
काम-धंधा छोड़कर भीख माँगते फिरते हो!
यहाँ से जाओ।”
नारद क्रोधित होकर बोले—
“प्रभु! यह व्यक्ति न आपको पहचानता है, न आदर करता है।
इसे अभी दंड दीजिए।”
भगवान ने शांति से कहा—
“नारद, देखो मेरी लीला।”
और सेठ को आशीर्वाद दिया—
“तेरा धन और बढ़े, तेरी तिजोरियाँ कभी खाली न हों।”
नारद स्तब्ध रह गए।
दूसरा द्वार – भक्ति का स्नेह
फिर वे एक टूटी-सी झोपड़ी के सामने रुके।
अंदर एक वृद्धा रहती थी—
संपत्ति के नाम पर बस एक गाय और प्रभु का नाम।
भगवान ने जैसे ही भिक्षा माँगी,
बुढ़िया मैया आनंद से भरकर बाहर आई।
साधुओं को आसन दिया,
और गाय का दूध लाकर बोली—
“प्रभु, मेरे पास यही है,
इसे ही चरणामृत समझकर स्वीकार करें।”
भगवान ने प्रेम से दूध ग्रहण किया।
नारद का हृदय द्रवित हो उठा।
उन्होंने कहा—
“प्रभु! यह आपकी सच्ची भक्त है।
कृपा करके इसे सुख-समृद्धि का वर दीजिए।”
भगवान कुछ क्षण मौन रहे और बोले—
“तथास्तु।”
और उसी क्षण उस गाय के प्राण हर लिए।
कृपा का रहस्य
नारद व्याकुल हो उठे—
“प्रभु! यह कैसी न्याय-लीला है?
सेठ को ध�

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