अयोध्या की गलियों में एक बुजुर्ग साइकिल मैकेनिक हैं— मोहम्मद शरीफ। दुनिया उन्हें ‘शरीफ चाचा’ के नाम से जानती है। उनके पास दौलत नहीं है, लेकिन दिल इतना बड़ा है कि उसमें पूरा हिंदुस्तान समा जाए।
1992 में उनके जवान बेटे रईस की हत्या हो गई थी। उसका शव लावारिस पड़ा रहा और जानवरों ने उसे नोच खाया। शरीफ चाचा अपने बेटे का अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाए। उस दिन उन्होंने कसम खाई, “आज के बाद अयोध्या में कोई भी लाश ‘लावारिस’ नहीं रहेगी।”
पिछले 30 सालों से 25000+ शवों को वे पुलिस स्टेशनों, अस्पतालों और रेलवे पटरियों से लावारिस शवों को इकट्ठा करते हैं। अगर मृतक हिंदू है, तो वे सम्मान से उसका दाह संस्कार करते हैं। अगर मृतक मुस्लिम है, तो उसे दफनाते हैं।
साइकिल पर लाशें ढोने वाले इस फरिश्ते को 2020 में भारत सरकार ने ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया। शरीफ चाचा ने साबित कर दिया कि खून के रिश्तों से बड़ा ‘इंसानियत’ का रिश्ता होता है।



