बिना जांच-पड़ताल के स्वीकार न हो कोई भी खबर या सूचना

युवा किसी भी देश की असली शक्ति और भविष्य की दिशा तय करने वाली ऊर्जा होते हैं। उनकी सोच, चरित्र, कौशल और संवेदनशीलता ही आने वाले समाज की तस्वीर बनाती है। आज का युग डिजिटल क्रांति का युग है—स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंटरनेट ने दुनिया को मुट्ठी में ला दिया है। ऐसे में युवाओं के सामने अवसर भी अपार हैं और चुनौतियाँ भी गंभीर।

डिजिटल अवसर: नई उड़ान के पंख

डिजिटल प्लेटफॉर्म ने शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। आज गांव का युवा भी ऑनलाइन कोर्स, वेबिनार, ई-लाइब्रेरी और स्किल डेवलपमेंट प्लेटफॉर्म के जरिए विश्वस्तरीय ज्ञान हासिल कर सकता है। यूट्यूब, ऑनलाइन लर्निंग ऐप्स और डिजिटल स्टार्टअप्स ने युवाओं को आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया है।
फ्रीलांसिंग, डिजिटल मार्केटिंग, कंटेंट क्रिएशन और आईटी सेक्टर जैसे क्षेत्रों में हजारों युवा अपनी पहचान बना रहे हैं। सही दिशा में उपयोग किया जाए तो डिजिटल दुनिया आत्मविश्वास, नवाचार और वैश्विक जुड़ाव का माध्यम बन सकती है।

डिजिटल भ्रम: जब स्क्रीन बन जाए वास्तविकता लेकिन हर चमक सोना नहीं होती।

सोशल मीडिया का आकर्षण कई बार युवाओं को आभासी दुनिया में इतना व्यस्त कर देता है कि वे वास्तविक जीवन के रिश्तों, पढ़ाई और व्यक्तित्व विकास से दूर हो जाते हैं।
सोशल मीडिया एल्गोरिदम यूज़र को वही कंटेंट बार-बार दिखाते हैं, जो उसकी पसंद का हो। इससे फ़िल्टर बबल बनता है, जहाँ व्यक्ति केवल एक ही तरह की सोच और जानकारी देखता है। धीरे-धीरे वह अलग नजरिए को स्वीकार करना बंद कर देता है।
कई बार भ्रामक खबरें, कट्टर विचारधाराएँ और भावनात्मक रूप से भड़काने वाले संदेश युवाओं को भ्रमित कर देते हैं। अनुभव की कमी और संवेदनशीलता के कारण वे जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। कुछ मामलों में यह मानसिक तनाव, आक्रोश या समाज से दूरी का कारण भी बन सकता है।

सत्यापन और नैतिकता की आवश्यकता

हर धर्म और नैतिक शिक्षा यह सिखाती है कि किसी भी खबर या सूचना को बिना जांच-पड़ताल स्वीकार नहीं करना चाहिए। कुरान में भी स्पष्ट निर्देश है कि किसी खबर को स्वीकार करने से पहले उसकी पुष्टि करें। यह शिक्षा आज के डिजिटल दौर में और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है।
युवाओं को चाहिए कि वे किसी भी वायरल पोस्ट, वीडियो या संदेश पर तुरंत प्रतिक्रिया न दें। पहले सोचें, स्रोत की जांच करें, और विश्वसनीय माध्यमों से पुष्टि करें। भावनात्मक प्रतिक्रिया की बजाय तर्क और विवेक का सहारा लें।

समाधान: पाबंदी नहीं, मार्गदर्शन जरूरी

समस्या का समाधान केवल इंटरनेट पर रोक लगाना नहीं है। असली समाधान है—सही मार्गदर्शन और डिजिटल साक्षरता।
स्कूलों और कॉलेजों में डिजिटल लिटरेसी प्रोग्राम चलाए जाएँ।
अभिभावक बच्चों से संवाद बनाए रखें और उनकी ऑनलाइन गतिविधियों के प्रति जागरूक रहें।
युवाओं को प्रमाणित अकादमिक स्रोतों, विश्वसनीय मीडिया और शिक्षकों से जानकारी लेने के लिए प्रेरित किया जाए। नैतिक, धार्मिक और सामाजिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा को मजबूत किया जाए।
संतुलन ही सफलता की कुंजी
डिजिटल दुनिया न तो पूरी तरह अच्छी है, न पूरी तरह बुरी। यह एक साधन है—जिसका परिणाम इस पर निर्भर करता है कि हम उसका उपयोग कैसे करते हैं।
यदि युवा तकनीक का संतुलित और जिम्मेदार उपयोग करें, अपने भावनात्मक रिएक्शन को पहचानें और सत्यापन के आधार पर निर्णय लें, तो डिजिटल युग उनके लिए अवसरों का स्वर्णिम द्वार बन सकता है।
अंततः, युवा ही राष्ट्र की दिशा तय करते हैं। यदि वे जागरूक, विवेकशील और नैतिक मूल्यों से जुड़े रहेंगे, तो डिजिटल युग भारत को नई ऊँचाइयों तक ले जाने में सहायक सिद्ध होगा।

(लेखक : जर्नलिस्ट कृष्ण प्रजापति कैथल से पत्रकारिता कर रहे हैं और जनसंचार एवं पत्रकारिता में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र से स्नातकोत्तर हैं।)

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