एक स्वस्थ पुरुष के किसी स्त्री के साथ संबंध बनाने के बाद जो वीर्य स्राव होता है, उसमें लगभग 40 मिलियन तक शुक्राणु मौजूद होते हैं। आसान शब्दों में कहें तो अगर उन सबको सही जगह यानी गर्भाशय तक पहुंचने का मौका मिल जाए, तो 40 मिलियन बच्चे जन्म ले सकते हैं।

लेकिन हकीकत यह है कि ये सभी शुक्राणु माँ की कोख की ओर मानो पागलों की तरह दौड़ते हैं, और इस लंबी दौड़ में केवल 300 से 500 तक ही टिक पाते हैं। बाकी रास्ते में ही थककर, हारकर खत्म हो जाते हैं।

ये 300 से 500 वही शुक्राणु होते हैं जो गर्भाशय तक पहुंचने में सफल हो पाते हैं।

और उनमें से भी केवल एक सबसे शक्तिशाली और सक्षम शुक्राणु होता है, जो अंततः अंडाणु से मिलकर निषेचन करता है।

क्या आप जानते हैं वह भाग्यशाली, मजबूत और विजेता शुक्राणु कौन था?

वह आप थे… मैं था… हम सब थे!

ज़रा सोचिए, जब आपने अपनी पहली दौड़ लगाई थी तब न आपकी आँखें थीं, न हाथ-पैर, न चेहरा—फिर भी आप जीत गए।

उस समय आपके पास कोई डिग्री नहीं थी, कोई दिमागी समझ नहीं थी, फिर भी आप विजेता बने।

कितने ही भ्रूण माँ की कोख में ही खो गए, लेकिन आप सुरक्षित रहे और आपने पूरे 9 महीने पूरे किए।

और आज…

आज जब ज़िंदगी में कोई मुश्किल आती है तो आप घबरा जाते हैं, थोड़ी सी परेशानी में निराश हो जाते हैं। लेकिन क्यों?

आपको क्यों लगता है कि आप हार गए हैं? आपने खुद पर भरोसा क्यों कम कर दिया है? अब तो आपके पास दोस्त हैं, परिवार है, ज्ञान है, अनुभव है—फिर भी आप मायूस क्यों हैं?

आप शुरुआत में जीते थे, अंत में भी जीत सकते हैं, और बीच के हर मोड़ पर जीत सकते हैं। बस परमात्मा (प्रकृति) पर विश्वास रखें और सच्ची लगन से अपने लक्ष्य के लिए पूरी मेहनत करें—वह आपको हारने नहीं देगा।

जिस तरह लाखों शुक्राणुओं में से आपको जीतने का अवसर मिला था, उसी तरह आज भी वही शक्ति आपको कामयाबी तक जरूर पहुंचाएगी।

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