प्यार और तकरार के बीच पनपते रिश्ते
दिल्ली , सामाजिक सौहार्द को प्रस्तुत करते दो नाटकों का मंचन मंडी हाउस के लिटिल थियेटर ग्रुप प्रेक्षागार, मंडी हाउस में किया गया । यह नाटक प्रस्ताव रंगमंडल द्वारा प्रस्तुत किए गये। पिछले 20 वर्षों से भारतीय रंगमंच पर हिंदी, उर्दू, बंगाली और मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की कृतियों को मंच पर पेश किया है । प्रस्ताव द्वारा प्रस्तुत नाट्य प्रस्तुतियां भारतीय साहित्य की कालजयी रचनाओं में रिश्ते और प्रेम और मध्यवर्गीय पारिवारिक संबंधों के ताने- बाने को नाटकों के माध्यम से मंच पर प्रस्तुत करता आया है ।
इस वर्ष प्रस्ताव अपना 20 वर्षगांठ मना रहा है इसी क्रम में संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से 10 अप्रैल को पद्मश्री इस्मत चुग़ताई के इंटरव्यू व उनकी चर्चित कहानी के महिला पात्रों पर केंद्रित नाटक प्रस्तुति” कागजी है पैरहन” का मंचन किया गया। महिला सशक्तिकरण को प्रस्तुत करें सशक्तिकरण को प्रस्तुत करती यह प्रस्तुति स्मृति के माध्यम से 1930 के दशक में एक मुस्लिम परिवार में बड़ी हो रही है लड़की के शिक्षा और समाज के प्रति नजरिए को लेकर 10 को को प्रस्तुत करती है इसमें चुकता ही और मंटों पर अश्लीलता का आरोप लगाते हुए उनकी कृतियों पर मुकदमा चला उसे दौर में लाहौर की अदालत में किस्मत और मंटो बराबर आधारित कार्रवाई के लिए प्रस्तुत है किस्मत चुकता ही की लिखी कहानी लिहाफ जो कि पर्दे के पीछे घर में रह रहे महिला के शारीरिक ज़रूरतों को दर्शाते हुए “लेस्बियन “रिश्ते
की और बढ़ती है और अपने शौहर से तलाक ले लेती है् उसे वक्त तक मुस्लिम सहित अथवा भारतीय साहित्य में इस तरह की कोई भी कृति सामने नहीं आई थी जिसके लिए इ्स्मत चुग़ताई पर फुहाशनिगारी का आरोप लगाया गया और मुकदमा चला । अंत में वह इस मुकदमे से बरी हुई।
उसे समय वह इंस्पेक्टर आफ स्कूल के तौर पर मुंबई में काम कर रही थी।
स्त्री पुरुष की समानता की बात करते हुए नाटक में इस्मत अपने अतीत में अपने बचपन की यादों में खो जाती है बहराइच जहां सैयद सालार मसूद गाजी की दरगाह के पास रहते हुए वहां के परिवेश को याद करती है और याद करती अपने घर की उन महिला पात्रों को जो भूत प्रेत के नाम पर भाड़ में झोक दी जाती है।
कुंवारी हुआ जिन्हें किसी मिट्टी के लौंडे ने हाथ तक ना लगाया था वह अपने आप को सैयद सलामत सऊद गाजी की महबूबा मानती है और दीवानगी की तरह उनसे इश्क गलती और बातचीत करती है घर में आने बाकी आने वाले वकील हां नमस्कार हकीम साहब उन्हें अमलतास के जुलाब यह कहते हुए देते हैं की शरीर की गर्मी दिमाग में चढ़ गई है वह इस दवाई के बाद मरणासन्न अवस्था में पहुंच जाती है वहीं दूसरी ओर विलायत में वकालत कर रहे पति से दूर अपनी खुशियां खान के बारे में कोई याद करती है जहां उनके पति ने विलायत में विदेशी मैं से शादी कर ली है और वह सब उनके खातों को सहजती है और उनसे बातें करती रहती है अंत में वह अपने रिश्ते के शब्बीर मामू के साथ उन्हें घर से भागता हुआ देखते हैं और याद करती है किस तरह धर्म और राजनीति की आड़ में महिलाओं को शोषण किया जाता है।
आजादी के बाद पहले दंगों के दौरान जो दहशत का माहौल था उसको याद करते हुए अपनी अम्मा की व्यथा को प्रस्तुत करती है क्या वतन पर की जूती होता है जब चाहता बदल दिया अपने जड़ों को छोड़कर कहीं भी चले जाने पर क्या वापस अपनी जड़ों से जुड़ा जा सकता है यह सभी याद करते हुए अंतिम वसीयत लिखते हुए वह दफना के बजाय मुंबई के चंदन बड़ी में अपनी चिता हिंदू रीति रिवाज के साथ करने को लिखती हैं।
मंच पर आर्यश्री आर्या ने किस्सागोई के साथ -साथ बदलते हुए चरित्रों के मनोभावों को खुबसूरती से प्रस्तुत किया।
बदलते हुए चरित्रों के साथ संतोष कुमार सिंह ” सैन्डी “का संगीत चरित्रों के मनोभावों को उभारता है।नाटक का निर्देशन अतिथि निर्देशक राजनारायण दीक्षित ने किया ।
समारोह की दूसरी संध्या में हिंदी साहित्य फिल्मों के कर चित लेखक और कथाकार दिव्य प्रकाश दुबे की चर्चित कहानियां ” लोलिता ” व” दे लिव्ड हैप्पली एवर आफ्टर”पर आधारित नाटक प्रस्तुति “प्रेम गलियन की बातों ” का मंचन हुआ ।
यह नाटक समाज में लड़कियों को लेकर पुरुष की मानसिकता को दर्शाता है। जो उसके जाने बिना जाने मुझे उसके चरित्र का हनन करते हैं तरह-तरह के किस्से कहानियां बनाते हैं इस तरह मयंक (आशुतोष शुक्ला ) अपने साथ पढ़ने वाली लड़की जिसका वह एक काल्पनिक नाम ” लोलिता ” रखता है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है अंत में लड़की ( तनिशी श्रीवास्तव )अपने पक्ष को स्पष्ट करते हुए बचपन से लेकर आज तक अपनी इस उम्र तक पुरुष मानसिकता के विषय में बताते हुए अपनी स्वतंत्रता को स्पष्ट करती है और मयंक को धिक्कारती है।
इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ने वाली प्रिया ( तनिशी श्रीवास्तव) और मयंक (मोहित। चुग )के बीच वैवाहिक रिश्तों ध नौकरी के संघर्ष को दर्शाती”दे लिव्ड हैप्पी एवर आफ्टर” के चरित्रों को कुशलता से प्रस्तुत किया। रूप सज्जा अनुराधा गौतम व पार्श्व मंच पर आरती द्विवेदी ,शिल्पा वर्मा ,ऋषि चौहान चैतन्य राज ,विजय ने अपनी भूमिकाओं को सफलता से निभाया। करनप्रीत गीत व संगीत संतोष कुमार सिंह सैंडी ने तैयार किया था निर्देशक नाटक के निर्देशक राज नारायण दीक्षित धे ।
इस नाट्य कार्यशाला में तैयार इन प्रस्तुतियों को रंगमंडल प्रमुख आर्याश्री आर्या के मार्ग दर्शन में तैयार किया गया
समारोह की तीसरी संध्या मानवीय रिश्तों की जटिलताओं को उजागर करता नाटक जिसमें प्रेम और शारीरिक इच्छा के बीच के संघर्ष को दर्शाया गया है। नाटक के पात्र अपनी भावनाओं और अपेक्षाओं के बीच फंसे हुए हैं, जो जीवन की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करता है।

नाटक में दिखाया गया है कि कैसे भौतिकवाद और आधुनिक जीवन की चुनौतियाँ रिश्तों को प्रभावित करती हैं, जिससे लोग अकेलापन और विच्छेद महसूस करते हैं। नाटक के पात्र अपने निर्णयों और भावनाओं के साथ जूझते हैं, जो हमारे अपने जीवन की कहानियों को प्रतिबिंबित करता है।Relationship Rhythms 2.0 एक नाटक है जो मानवीय रिश्तों की जटिलताओं को उजागर करता है, जिसमें प्रेम, शारीरिक इच्छा, और भौतिकवाद के बीच के संघर्ष को दर्शाया गया है। नाटक के पात्र अपनी भावनाओं और अपेक्षाओं के बीच फंसे हुए हैं, जो जीवन की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करता है।

नाटक प्रकृति की सुंदरता और जीवन के सरल सुखों का जश्न भी मनाता है, जो हमें जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं की याद दिलाता है। यह नाटक हमें अपने रिश्तों और जीवन को पुनः मूल्यांकित करने के लिए प्रेरित करता है।
हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकारों की कृतियों पर आधारित यह नाटक गोविंद मिश्र की कहानी “खुद के खिलाफ” व काशीनाथ सिंह की चर्चित कहानियां “सुख व “खरोंच” पर आधारित है। मुख्य भूमिकाओं में शिल्पा वर्मा, आशुतोष शुक्ला,राज नारायण, विजय,ऋषि चौहान व मोहित चुग ने अपनी- अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया। दृश्य अनूपपुर संगीत डिजाइन संतोष कुमार सिंह सैंडी ने किया । नाटक का निर्देशन राज नारायण दीक्षित ने किया।

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