बिहार की सड़कों पर गूंजता यह नारा अब केवल राजनीतिक नाराजगी का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि लोकतंत्र में जनता के अधिकारों की पुनःस्थापना का उद्घोष बन चुका है। राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में निकली वोटर अधिकार यात्रा इस समय बिहार की जनता में एक नये आत्मविश्वास का संचार कर रही है। भीषण बरसात हो, धूप-आंधी हो या कच्चे रास्ते, लोगों की भीड़ यह दिखा रही है कि लोकतंत्र केवल वोट डालने तक सीमित नहीं, बल्कि वोट की रक्षा करना भी जनता का कर्तव्य है।

यात्राओं का संदेश: संघर्ष और सजगता

भारतीय राजनीति में यात्राओं की परंपरा पुरानी रही है—महात्मा गांधी की दांडी यात्रा से लेकर आज़ादी के बाद की तमाम राजनीतिक पदयात्राओं तक। यात्राएं केवल भौगोलिक दूरी तय करने का साधन नहीं होतीं, बल्कि जनमानस की चेतना जगाने का माध्यम होती हैं। राहुल गांधी की भारत जोड़ो और भारत जोड़ो न्याय यात्राओं के बाद यह तीसरी बड़ी यात्रा इस बात का संकेत है कि विपक्ष अब केवल संसद में सवाल उठाकर नहीं, बल्कि जनता के बीच जाकर लोकतंत्र की नींव को मजबूत करना चाहता है।

मतदाता सूची पर विवाद: साध्य और साधन का प्रश्न

विवाद की जड़ में मतदाता सूची का तथाकथित “शुद्धिकरण” है। चुनाव आयोग इसे तकनीकी प्रक्रिया बताता है, लेकिन जब विपक्ष का आरोप है कि 65 लाख नाम काट दिए गए और नए नाम जोड़े नहीं गए, तो यह मात्र तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक सवाल भी है। महात्मा गांधी ने कहा था—साध्य और साधन दोनों की पवित्रता आवश्यक है। यदि मतदाता सूची से छेड़छाड़ का संदेह भी है, तो यह लोकतंत्र के मूल आधार को खोखला करता है।

सुप्रीम कोर्ट की फटकार: लोकतंत्र को राहत

चुनाव आयोग जिस एसआईआर (Shrihari Voter Reverification) प्रक्रिया को ढाल बना रहा था, उस पर सुप्रीम कोर्ट ने ही सवाल उठाकर कहा कि आधार कार्ड जैसे सामान्य और सबके पास उपलब्ध दस्तावेज को भी स्वीकार किया जाए। इससे साफ है कि विपक्ष जो शुरू से कह रहा था, उसमें सच्चाई का अंश है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि लोकतंत्र की रक्षा अभी भी संस्थाओं के भीतर संभव है।

नारे की ताक़त: जनता की नई ऊर्जा

‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’—यह पंक्ति कभी लोकतंत्र की धड़कन बनी थी। आज वही भूमिका “वोट चोर, गद्दी छोड़” निभा रहा है। यह नारा उन लाखों लोगों की आवाज है जिन्हें लगने लगा था कि शिकायत करने का कोई मतलब नहीं। आज वही लोग सड़कों पर उतरकर बता रहे हैं कि लोकतंत्र केवल किताबों में नहीं, बल्कि जनता की रगों में जिंदा है। छोटे-छोटे बच्चे जब यही नारा लगाते हैं, तो यह केवल विरोध नहीं, बल्कि राजनीतिक जागरूकता की नयी पीढ़ी का जन्म है।

लोकतंत्र बनाम सत्ता

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का कथन था—“सरकारें आएंगी, जाएंगी, पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी, मगर यह देश रहना चाहिए।” आज सवाल यही है कि क्या देश के लोकतंत्र को बचाए रखने का दायित्व सत्ताधारी दल निभा रहा है, या विपक्ष? विडंबना यह है कि स्वयं वाजपेयी की पार्टी आज उन्हीं संस्थाओं को कठपुतली बनाने के प्रयास में है, जिनकी निष्पक्षता लोकतंत्र की आत्मा है।

बिहार की धरती से उठा यह नारा आने वाले समय का राजनीतिक संकेत है। यह केवल चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की चेतावनी है। जब जनता सड़कों पर उतरती है, तो सबसे सशक्त संस्थाएं भी झुकने को विवश हो जाती हैं। यह यात्रा और यह नारा हमें याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र केवल वोट देने तक नहीं, बल्कि वोट की रक्षा तक जिम्मेदारी है। और जब जनता यह जिम्मेदारी उठाती है, तो सचमुच लोकतंत्र जीवित रहता है, सांस लेता है और आगे बढ़ता है।

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