भादो मास की गणेश चतुर्थी पर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच गणेश प्रतिमाएं स्थापित वाराणसी, 27 अगस्त (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी काशी में भादो मास की गणेश चतुर्थी पर बुधवार को वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान गणेश की मूर्ति पंडालों में स्थापित की गई। भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित कर हवन पूजन के बाद उसमें प्राण प्रतिष्ठा की गई। विविध धार्मिक अनुष्ठान के बाद पंडालों का पट दोपहर में श्रद्धालुओं के लिए खुल गया। उधर, अलसुबह से लोहटिया स्थित बड़ा गणेश दरबार सहित सभी गणेश मंदिरों में व्रती महिलाओं के साथ उनके परिजन भी दर्शन पूजन के लिए पहुंचते रहे।

शिव पुराण के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को मंगलमूर्ति गणेश जी की अवतरण-तिथि मानी गई है। शास्त्रों के अनुसार इसी दिन रिद्धि सिद्धि के दाता, विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश का अवतरण हुआ था। गणेश जी को समस्त देवताओ में प्रथम पूज्य देव कहा गया है। श्री गणेश जी सुख समृद्धि दाता भी हैं। इसी क्रम में ठठेरी बाजार स्थित शेरवाली कोठी में काशी मराठा गणेश उत्सव समिति की ओर से आयोजित गणेशोत्सव में पहले दिन मुम्बई के सुप्रसिद्ध लालबाग के राजा की प्रतिमूर्ति को वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विराजित कराया गया। मराठा विधि से पं. धनंजय खुंटे महराज व नितिन उपाध्याय ने मंत्रोंच्चार के बीच मूर्ति स्थापित कराई।

उत्सव समिति के अध्यक्ष आनंद राव सूर्यवंशी व पदाधिकारियों ने श्री गणेश भगवान का पूजन किया। प्रदेश सरकार के आयुष मंत्री डॉ दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ ने पूजन व महाआरती की। समिति के वरिष्ठ संरक्षक माणिक राव पाटिल, संरक्षक संतोष पाटिल, अध्यक्ष आंनद राव सूर्यवंशी, महामंत्री अन्ना मोरे, कोषाध्यक्ष हनुमान शिंदे ने राज्यमंत्री की अगवानी की। पंडाल में सांयकाल छह बजे से जय पाण्डेय (ग्रुप) श्री गणेश के सम्मुख जागरण की प्रस्तुति देंगे। अगस्त्यकुंडा स्थित श्री राधाकृष्ण मंदिर में श्री गणेशोत्सव सेवा समिति की ओर से और रामघाट पर श्री वल्लभराम शालिग्राम सांग्वेद विद्यालय में गणेशोत्सव उल्लास के साथ शुरू हुआ।

नूतन बालक गणेशोत्सव समाज सेवा मंडल की ओर से भी सात दिवसीय महोत्सव का आगाज हुआ। पंडालों में गणपति बप्पा मोरया के जयकारे के साथ पूजन आरंभ हो गया। बाल गणेश की प्राकट्य की बेला में मंदिरों में श्रृंगार, पूजन एवं आरती के विधान संपादित किए गए, वहीं विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों द्वारा विविध सांस्कृतिक अनुष्ठानों के आयोजन भी आरंभ हो गए। वेदमंत्रों के साथ षोडशोपचार पूजन किया गया। मंगलमूर्ति को लड्डू व मोदक का भोग लगा।

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