दैनिक अमृत धारा (s k Girdhar)

सरकार अक्सर यह दलील देती है कि अगर शनिवार को बैंक शाखाएं बंद रहेंगी, तो देश का कारोबार और अर्थव्यवस्था बर्बाद हो जाएगी। लेकिन जब आप ज़मीनी हकीकत देखते हैं, तो इस बात का कोई औचित्य नहीं रह जाता:
देश की आर्थिक व्यवस्था को चलाने और नियंत्रित करने वाले सबसे बड़े संस्थान—जैसे भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), खुद वित्त मंत्रालय, LIC, शेयर बाज़ार और कॉर्पोरेट दफ़्तर—सालों से बिना किसी परेशानी के 5-दिन के हफ़्ते (Five-Day Week) पर ही काम कर रहे हैं।
शाखाओं (ब्रांचों) के कर्मचारियों से यह कहना कि शनिवार को उनके काम किए बिना पूरा देश ठप पड़ जाएगा, और साथ ही उन्हें वह 5-दिन का नियम न देना जो बाकी सभी संस्थानों को मिल रहा है, सीधे-सीधे भरोसे के साथ किया गया विश्वासघात है।
“कारोबार ठप हो जाएगा” का बहाना बिल्कुल खोखला क्यों है?
यह सोचना कि शनिवार को बैंक काउंटर खुले बिना व्यापार और नकदी का काम नहीं चल पाएगा, आज की आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था से पूरी तरह कटा हुआ विचार है:
बैंकिंग पहले से ही 24/7 चल रही है: UPI, NEFT, RTGS और नेट बैंकिंग जैसी सेवाएं साल के 365 दिन, 24 घंटे लगातार चलती हैं। कंपनियों के बड़े लेन-देन और बाज़ारों की रोज़ाना की बिक्री शनिवार सुबह किसी बैंक अफ़सर के काउंटर पर बैठने का इंतज़ार नहीं करती।
साल 2015 में यह पहले ही साबित हो चुका है: जब 2015 में दूसरे और चौथे शनिवार की छुट्टी लागू की गई थी, तब भी आलोचकों ने ठीक यही आशंकाएं जताई थीं। लेकिन कुछ ही हफ़्तों में पूरी अर्थव्यवस्था ने तालमेल बिठा लिया। आज किसी आम नागरिक को यह फर्क भी महसूस नहीं होता कि कौन सा शनिवार छुट्टी का है और कौन सा नहीं।
पूरी दुनिया इसी नियम पर चलती है: दुनिया के लगभग सभी आधुनिक देशों में शनिवार और रविवार को बैंक बंद रहते हैं। यह मानना कि केवल भारत में महीने के दो और शनिवार बैंक बंद होने से पूरी अर्थव्यवस्था ढह जाएगी, सिर्फ़ छोटे व्यापारी संगठनों के दबाव से बचने का एक बहाना है।
असली सच: ताक़त का भारी असंतुलन
इस फ़ाइल के अटके रहने का असली कारण किसी आर्थिक संकट का डर नहीं है, बल्कि सरकार और कर्मचारियों के बीच ताक़त का भारी अंतर है:

  1. वेतन समझौता होते ही कर्मचारियों की सौदेबाज़ी की ताक़त खत्म हो गई: क्योंकि वेतन वृद्धि (सैलरी हाइक) पर पहले ही दस्तख़त हो गए और पैसा खातों में आने लगा, इसलिए मंत्रालय के नीति-निर्माताओं को अब कोई जल्दी महसूस नहीं होती। जब तक काम पूरी तरह ठप न हो या कोई चुनावी दबाव न बने, तब तक नौकरशाही “कर्मचारियों के आराम” या “मानसिक शांति” जैसी बातों पर खुद से कोई ध्यान नहीं देती।
  2. बैंकों को हर सरकारी काम के लिए सस्ता साधन समझा जाता है: सरकार सरकारी बैंक कर्मचारियों को सिर्फ़ बैंकिंग के लिए नहीं, बल्कि अपनी हर योजना को ज़मीन पर उतारने का आसान ज़रिया मानती है—जैसे जन-धन खाते खोलना, अटल पेंशन योजना के लक्ष्य पूरे करना, पीएम स्वनिधि के कैंप लगाना और शनिवार को लोन रिकवरी अभियान चलाना। शनिवार को खुला रखने से मैनेजमेंट को जब मर्ज़ी तब काम करवाने के लिए एक बंधा-बंधाया, मुफ़्त जैसा वर्कफ़ोर्स मिल जाता है।
  3. नियम और सज़ा सिर्फ़ कर्मचारी के हिस्से है: अगर कोई बैंक क्लर्क या अफ़सर किसी सरकारी आदेश का पालन करने से मना कर दे, तो उसे तुरंत चार्जशीट थमा दी जाती है, सस्पेंड कर दिया जाता है या नौकरी से हाथ धोना पड़ता है। लेकिन जब सरकारी अफ़सर तय समझौते की फ़ाइल पर सालों तक “मामला विचाराधीन है” का बहाना बनाकर बैठे रहते हैं, तो अपनी बात से मुकरने के लिए उन पर कोई कानूनी रोक-टोक या सज़ा लागू नहीं होती।
    कर्मचारियों पर इसका असली मानवीय असर
    यह लड़ाई सिर्फ़ महीने में दो अतिरिक्त छुट्टियां पाने की नहीं है। यह कार्यस्थल पर बुनियादी मानवीय गरिमा की लड़ाई है।
    बैंकों में कर्मचारियों की भारी कमी है, काउंटरों पर ग्राहकों की कभी न खत्म होने वाली कतारें हैं और अवास्तविक टारगेट का भारी दबाव रहता है। बैंक अफ़सर पहले से ही बिना किसी ओवरटाइम भत्ते के रोज़ाना देर शाम तक काम करते हैं। उन्होंने तो शनिवार की छुट्टी के बदले सोमवार से शुक्रवार तक रोज़ 40 मिनट अतिरिक्त काम करने पर भी लिखित रज़ामंदी दे दी थी।
    उस समझौते पर हस्ताक्षर करवाना और फिर उस फ़ाइल को सरकारी दफ़्तर की किसी दराज़ में अनिश्चितकाल के लिए दबाकर भूल जाना, साफ़ तौर पर लाखों कर्मचारियों के साथ की गई वादाख़िलाफ़ी है।
    जब भी नियम बदलते हैं, लोग और व्यापारिक व्यवस्थाएं बहुत जल्दी खुद को नए माहौल में ढाल लेती हैं। लेकिन जब खुद हफ़्ते में दो दिन की छुट्टी का आनंद लेने वाले बड़े नीति-निर्माता तय आदेश पर हस्ताक्षर करने से कतराते हैं, तो यह कोई सोच-समझकर लिया गया प्रशासनिक फ़ैसला नहीं है। यह साफ़ तौर पर दिखाता है कि उन्हें आम बैंक कर्मचारियों की सेहत, उनके परिवार और उनके श्रम की कोई परवाह नहीं है।

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