फुर्सत के दिन होते हैं
और दिनों से कुछ ज़्यादा तंग,
समय की अलमारी में
दबा कर रख लिए जाते हैं
अनेक छोटे – बड़े काम,
फुर्सत के दिनों में करने के लिए,
जो एक – एक कर
निकलते हैं बाहर ।
मानो काम नहीं, बाबा की
रहस्यमय पोटली हो कोई ।
खत्म ही नहीं होती ।
फुर्सत के दिन सूरज के साथ खेलकर,
थक जाते हैं बहुत,
लेकिन फिर भी उनका मन नहीं भरता
गपशप करने लगते हैं,
चाँद के साथ भी ।
रातें छोटी होने लगती हैं,
समझ नहीं आता, कि सुबह की किरणें
आँखों की दोस्त हैं या दुश्मन ।
थोड़ा ज़्यादा सुस्ताने भी नहीं देतीं ।
आराम और काम की लड़ाई में,
बहुत थक जाते हैं
फुर्सत के दिन ।
न काम ख़त्म होता है,
न आराम ख़त्म होता है ।
और फिर से मन इंतज़ार करने लगता है
फुर्सत के दिनों का ।
जब वह आराम के धोखे में,
निपटा सके ढेरों काम ।
डॉ. रक्षा मेहता 9493887463



