वे उस व्यवस्था की विफलता के शिकार बने हैं जो अक्सर दुर्घटना के बाद जागती है और कुछ समय बाद फिर सो जाती है।
पैसा कमाने की अंधी होड़ में नियम, कायदे, मानक और सुरक्षा प्रावधान अक्सर सबसे पहले कुर्बान किए जाते हैं।
नियम बनाने वाले हैं, नियम लागू कराने वाले हैं, निरीक्षण करने वाले हैं, प्रमाणपत्र जारी करने वाले हैं।
लेकिन हादसे के बाद अक्सर पता चलता है कि कागजों पर सब कुछ दुरुस्त था और जमीन पर कुछ भी नहीं यह विरोधाभास संयोग नहीं हो सकता।
हमारे यहां अक्सर हादसे के बाद की सक्रियता, हादसे से पहले की निष्क्रियता को ढंकने का काम करती है।
कुछ दिनों तक खानापूर्ति चलती है, फाइलें खुलती हैं, नोटिस जारी होते हैं, तस्वीरें खिंचती हैं फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है।
हैरानी की बात यह है कि हर त्रासदी के बाद भी सबक स्थायी नहीं होते क्योंकि समस्या सिर्फ नियमों की नहीं, नीयत की भी है।
उत्तरप्रदेश। लखनऊ में हुए दर्दनाक हादसे पर दुःख व्यक्त करते हुए लोगों ने कहा कि निसंदेह बहुत ही मार्मिक दुर्घटना रही, बच्चों का जाना परिवार के उजड़ जाने से जुड़ा हैं। सुरक्षा की प्रति उदासीनता वाकई गैरजिम्मेदारी प्रदर्शित करती हैं। भ्रष्टाचार से लबरेज प्रशासन क्या कम दोषी हैं…?
कितनी देर में दमकल पहुंची क्यों नहीं बचा पाई बच्चों की कीमती जान?
लखनऊ में जिन बच्चों की जान गई और जो घायल हुये हैं, वे किसी प्राकृतिक आपदा के शिकार नहीं हुए। वे उस व्यवस्था की विफलता के शिकार बने हैं जो अक्सर दुर्घटना के बाद जागती है और कुछ समय बाद फिर सो जाती है।
पैसा कमाने की अंधी होड़ में नियम, कायदे, मानक और सुरक्षा प्रावधान अक्सर सबसे पहले कुर्बान किए जाते हैं। भवन खड़े हो जाते हैं, मंजिलें बढ़ जाती हैं, कमरे भर दिए जाते हैं, कारोबार फैल जाता है, लेकिन सुरक्षा इंतजाम उतने ही रह जाते हैं जितने किसी निरीक्षण के समय दिखाने के लिए जरूरी हों। यह केवल किसी एक संस्था या एक शहर की समस्या नहीं है। यह एक व्यापक मानसिकता है। जहां सुरक्षा को निवेश नहीं, खर्च माना जाता है। इस पूरे तंत्र में केवल लापरवाही ही नहीं, अवसरवाद भी गहरे तक मौजूद है।
नियम बनाने वाले हैं, नियम लागू कराने वाले हैं, निरीक्षण करने वाले हैं, प्रमाणपत्र जारी करने वाले हैं लेकिन हादसे के बाद अक्सर पता चलता है कि कागजों पर सब कुछ दुरुस्त था और जमीन पर कुछ भी नहीं। यह विरोधाभास संयोग नहीं हो सकता। विभिन्न स्तरों पर आंखें मूंदी जाती हैं, समझौते होते हैं – जिम्मेदारियां सुविधानुसार हल्की कर दी जाती हैं। यही कारण है कि हर बड़े हादसे के बाद एक परिचित दृश्य सामने आता है। अधिकारी दौड़ते हुए पहुंचते हैं, जांच समिति बनती है। बयान जारी होते हैं। सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया जाता है। कुछ जगहों पर औचक निरीक्षण शुरू हो जाते हैं। मानो व्यवस्था अचानक चुस्त-दुरुस्त हो गई हो।
लेक़िन इस दर्दनाक हादसे के बाद अब उत्तरप्रदेश के शहरों में भी चेकिंग होगी, और जोर शोर से होगी, और कुछ दिन बाद फिर सब ठंडा पड़ जाएगा। जबकि तमाम शहरों में ऐसी ही दर्दनाक घटनाएं हुए हैं और कभी भी कहीं भी बड़ा हादसा हो सकता है। क्या प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारी हादसे का ही क्यों इंतज़ार करते हैं? ये काम पहले भी हो सकता था लेक़िन जमीन पर कोई ठोस काम नहीं होता?
हमारे यहां अक्सर हादसे के बाद की सक्रियता, हादसे से पहले की निष्क्रियता को ढंकने का काम करती है। कुछ दिनों तक खानापूर्ति चलती है, फाइलें खुलती हैं। नोटिस जारी होते हैं। तस्वीरें खिंचती हैं फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है। हैरानी की बात यह है कि हर त्रासदी के बाद भी सबक स्थायी नहीं होते। क्योंकि समस्या सिर्फ नियमों की नहीं, नीयत की भी है। सिर्फ़ (आरके उपाध्याय, वीपी शुक्ला, टीके जायसवाल और एसके साहू) की चार गिरफ्तारीयों से 80 सालों के भ्र्ष्टाचार से शनी व्यवस्था कभी साफ़ नहीं हो सकती। अब, इस शड़ी व्यवस्था को टोटल क्लीन करने के लिए उत्तरप्रदेश में सीएम योगी जैसे 5 उपमुख्यमंत्री और होने चाहिए।



