दैनिक अमृत धारा/रविन्द्र पोपली /चण्डीगढ़ : यज्ञ शरीर की नाभि की तरह है। यह परोपकार की भावना को बढ़ाता है। गृहस्थी को इसे विशेष तौर पर अपने समर्थ के अनुसार करना चाहिए। यज से पर्यावरण स्वच्छ रहता है। उपरोक्त शब्द आर्य समाज सेक्टर 7 बी, चण्डीगढ़ के 67वें वार्षिक उत्सव के दौरान सहारनपुर से पधारे आचार्य विरेन्द्र शास्त्री ने प्रवचन के दौरान कहे। उन्होंने कहा कि यज्ञ ईश्वर प्राप्ति का सुगम साधन है। यज्ञ करने वाला व्रती होता है। वह ईश्वर का साक्षात्कार करने में समर्थ होता है। समिधा समता की धारा है। इससे परिवार एवं राष्ट्र का कल्याण होता है। घृत स्नेह अर्थात प्रेम का प्रतीक है। प्रेम रूपी घी से परिवार एवं राष्ट्र का उत्थान होता है। सामग्री सुगंधि को फैलाता है। सुगंध से राष्ट्र में यश एवं कीर्ति को बढ़ाता है। इस प्रकार यज समता, प्रेम और सुगंध का प्रसार करता है। कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातःकालीन कार्यक्रम के अंतर्गत प्रातः यज्ञ, भजन एवं आशीर्वचन से हुआ। आचार्य विरेन्द्र शास्त्री जी, सहारनपुर यज्ञ ब्रह्मा के तौर पर उपस्थित रहे। यज्ञ संयोजक आचार्य अमितेश कुमार पुरोहित थे। भजनोपदेशक पंडित भूपेन्द्र सिंह आर्य ने ऐ ऋषि याद आए जमाना तेरा, संसार का किया है उपकार महर्षि ने, चली जा रही है यह जीवन की रेल, समझ कर खिलौना यूँ न रोल आदि भक्तिमय गीत प्रस्तुत किए।

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