नहीं जानती हूं रिझाना किसी को
नहीं जानती हूं मनाना किसी को
जो होता है मन में कह देती हूं साफ
बनावट नहीं आती मुझे करना माफ
सजना संवरना बिल्कुल भाता नहीं है
हां मुझे प्यार करना आता नहीं है

थोड़े ही लोगों से करती हूं बात
सो जाती हूँ जल्दी हो जाते ही रात
झूठी हंसी मुंह पे चिपकाती नहीं हूं
पाउट बनाके फोटो खिंचाती नहीं हूं
ज्यादा केयरिंग बनना सुहाता नहीं है
हां मुझे प्यार करना आता नहीं है

घुंघराले हैं बाल स्ट्रेट नहीं है
कपड़ों की कलेक्शन ग्रेट नहीं है
हंस देती हूं अक्सर धीमे से मंद मंद
दोस्त बना रखे हैं बस चंद
रोमांटिक होना सुझाता नहीं है
हां मुझे प्यार करना आता नहीं है

गोरा नहीं रंग सांवली हूं थोड़ी
समझदार कभी बावली हूं थोड़ी
खाना बनाने का शौंक नहीं है
सिंपल है लाइफ कोई छौंक नहीं है
फालतू नखरे दिखाना आता नहीं है
हां मुझे प्यार करना आता नहीं है

कविता गजल बस यही हूं रचती
ग़ालिब गुलज़ार की पंक्तियां हैं जचती
पतझड़ से प्यारा मुझे लगता बसंत है
प्रेम करके निभाना कठिन अत्यंत है
मर जाना किसी पर लुभाता नहीं है
हां मुझे प्यार करना आता नहीं है

रिया अग्रवाल

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