आधी शब औ पूरा चाँद ,
मुझसा बिल्कुल तन्हा चाँद ।
छत पर गुमसुम बैठा है,
जाने किसका रूठा चाँद ।
कितना आज मुनव्वर है,
देखो जानां तुम सा चाँद ।
सागर से ही निकला था,
सागर में ही डूबा चाँद ।
तेरी ज़ुल्फ़ों को छू कर,
शब भर कितना महका चाँद ।
महफ़िल में आऊँगा मैं,
इकदिन लेकर अपना चाँद ।
घर में है या दफ़्तर में,
ग़ैर किधर है मेरा चाँद ।
अनुराग मिश्र ग़ैर
लखनऊ



