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ग़ज़ल

May 16, 2026
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ग़ज़ल

आधी शब औ पूरा चाँद ,
मुझसा बिल्कुल तन्हा चाँद ।

छत पर गुमसुम बैठा है,
जाने किसका रूठा चाँद ।

कितना आज मुनव्वर है,
देखो जानां तुम सा चाँद ।

सागर से ही निकला था,
सागर में ही डूबा चाँद ।

तेरी ज़ुल्फ़ों को छू कर,
शब भर कितना महका चाँद ।

महफ़िल में आऊँगा मैं,
इकदिन लेकर अपना चाँद ।

घर में है या दफ़्तर में,
ग़ैर किधर है मेरा चाँद ।

      अनुराग मिश्र ग़ैर 
          लखनऊ

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