मंच पर ” बे -लिबास ,’कागज़ी है पैरहन’ और ‘प्रेम गलियों की बातें’ ,की कहानियों की गूंज

मुंबई , प्रस्ताव दिल्ली द्वारा मुंबई में मुंबई साहित्यिक नाटकों का आयोजन किया गया इस तीन दिवसीय नाटकों के आयोजन में तीन नाटकों की पांच प्रस्तुतियां हुई ।जो वेदा चौबारा में राज नारायण दीक्षित के निर्देशन में और आर्यश्री के एकल अभिनय में इस्मत चुगताई के जीवन के चुनिंदा पलों को नाटकीय कथन में देखना एक सुखद अनुभव रहा , ख़ासकर दो कारणों से। पहला तो स्पष्ट रूप से इस्मत चुगताई हैं, जो जीवन के प्रति मर्दाना नज़रिया रखने वाली महिला के रूप में जानी जाती हैं। दूसरा कारण थी एकल अभिनेत्री आर्यश्री, जिन्होंने अपनी आवाज़ के बदलाव और हर किरदार के लिए एक दुपट्टे को अलग अंदाज़ में ओढ़कर बुआ, आपा और माँ जैसे कई किरदारों को दर्शकों के सामने जीवंत कर दिया।

इस प्रस्तुति में अभिनेत्री की असली परीक्षा वे दृश्य थे जो शुरू में हास्य पैदा करते हैं और फिर करुण क्षणों में बदल जाते हैं। मरती हुई महिला कुसिया आपा का अभिनय, बुआ की समझदारी और विभाजन के दंगों में विलाप करती माँ की पीड़ा को आर्यश्री ने बेहद खूबसूरती से निभाया। पटकथा इस बात पर ज़ोर देती है कि विभाजन ने लोगों को केवल अलगाव ही नहीं, बल्कि अनचाहे उजड़ने और नई शुरुआत के लिए अनचाहे इंतज़ार का बोझ भी सहने पर मजबूर किया।

एक एकल कलाकार को बदलते किरदारों को निभाने के लिए आवाज़ और शैली में विविधता का हमेशा रिहर्सल करना पड़ता है। नसीरुद्दीन शाह का कई लोगों का किरदार निभाना और ‘ब्रोकन इमेजेज़’ में शबाना आज़मी का एक साथ दो बहनों को निभाना याद आ गया। आर्यश्री जैसे उभरते कलाकारों ने एकल प्रदर्शन की कला में अपने छोटे-छोटे कदम तो शुरू कर ही दिए हैं और हम उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य में थिएटर और भी जीवंतता देखेगा। एकमात्र उम्मीद अच्छे निर्देशक और मेहनती कलाकार दल हैं,जब सामान्य सहजता हासिल करना कठिन हो सकता है लेकिन असंभव नहीं है।

इस नाटक के बाद प्रस्ताव टीम ने दो नये नाटक प्रस्तुत किये। ‘प्रेम गलियों की बातें’ नाटक में ‘लोलिता’ और ‘दे लिव्ड हैप्पिली एवर आफ्टर’ की कहानी एक और अच्छा मनोरंजन था। आशुतोष शुक्ला और तनिषी श्रीवास्तव ने दोनों कहानियों में प्रभावशाली भूमिकाओं का प्रदर्शन किया। ‘लोलिता’ समकालीन समाज की एक महिला-केंद्रित कहानी है जिसमें महिलाएँ पुरुषों द्वारा आसानी से बदनाम कर दी जाती हैं, जबकि पुरुषों की सोच पितृसत्तात्मक अंधेपन से ग्रस्त रहती है वहीं दूसरी ओर प्रेम और नियति पर मानवीय कर्मों की विडंबना है। प्रेमी जो पति-पत्नी बनते हैं, केवल संवाद की कमी झेलते हैं और अपने जीवन में गलत फैसले ले लेते हैं। यह कहानी विश्वास और बंधन का संदेश देती है कि बदलते जीवन के बावजूद, अगर सब कुछ साझा करने का ध्यान रखा जाए तो मानवीय कर्मों से मानवीय विफलता को न्योता नहीं मिलेगा!
तीसरी प्रस्तुति ‘बे-लिबास’में इंसानी फितरत परिस्थितियों के अनुसार स्त्री पुरुष के शोषण करने की प्रवृत्ति को दर्शाता हुआ। हर प्रसंग और वाक्य के बाद दर्शकों को एक झटका देता है वह झटका हास्य और करूं कोरोना से भरा होता है दशक निर्णय भी नहीं कर पाते हैं असमंजस की स्थिति में वह किस पक्ष की तरफ खड़े हो। इंसानी फितरत और उसके गुनाह करने की प्रवृत्ति को सामने लाता हुआ अजीज कुरैशी लिखित नाटक बे-लिबाज जिसका सफल निर्देशन राजनारायण दीक्षित ने किया।
वर्सोवा ,आरामनगर के “रंगशिला थिएटर” में प्रदर्शित नाटक ‘बे-लिबास’ और ‘प्रेम गलियों की बातें’ की सह निर्देशक आर्या थी।राज नारायण दीक्षित, आशुतोष शुक्ला, नेआर्यश्री आर्या , मोहित चुग , चैतन्य राज ,विजय जैन , कुलदीप कुमार, तनिषी श्रीवास्तव ,रेनू दीक्षित,आरती द्विवेदी, ने अपनी भूमिकाओं का सफलतापूर्वक निर्वहन किया।

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